छुपकर बहन की साड़ी के नीचे आग लगाई

JaiJai
Feb 2, 2026 - 18:30
Feb 2, 2026 - 18:32
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छुपकर बहन की साड़ी के नीचे आग लगाई

बारिश की रात थी। बिजली चली गई थी और घर में सिर्फ मोमबत्ती की हल्की-हल्की रोशनी थी। मम्मी-पापा दोनों सोने के लिए ऊपर कमरे में चले गए थे। नीचे हॉल में मैं और मेरी बड़ी बहन नेहा अकेले थे।

नेहा दीदी आज ऑफिस से लौटकर सीधे स्नान करके आई थीं। हल्की गुलाबी साड़ी पहनी थी — वो साड़ी जो उनके बदन पर बिल्कुल चिपक जाती है। बारिश में भीगने की वजह से साड़ी थोड़ी पारदर्शी हो गई थी। ब्लाउज के नीचे से काली ब्रा की झलक साफ दिख रही थी।

मैं सोफे पर लेटा हुआ था। दीदी आईं और मेरे बगल में बैठ गईं। उनकी जाँघ मेरी जाँघ से सटी हुई थी। वो चुपचाप मेरी तरफ देख रही थीं।

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"नींद नहीं आ रही?" दीदी ने धीमी आवाज़ में पूछा। "नहीं… गर्मी बहुत है।" मैंने कहा। दीदी हल्के से हँसीं। "गर्मी बाहर की है या अंदर की?"

मैं कुछ बोल नहीं पाया। बस उनकी आँखों में देखता रहा। उन्होंने धीरे से अपना पल्लू कंधे से सरकाया। अब ब्लाउज पूरी तरह नज़र आ रहा था। उनकी छातियाँ हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं।

"तू हमेशा चुपके-चुपके देखता है ना?" दीदी ने फुसफुसाकर कहा। "आज देख ले… जितना मन करे। कोई नहीं आएगा।"

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। दीदी ने मेरे हाथ को पकड़ा और धीरे से अपनी जाँघ पर रख दिया। साड़ी के ऊपर से भी उनकी त्वचा की गर्मी महसूस हो रही थी।

"दीदी… ये गलत है…" मैंने कमज़ोर आवाज़ में कहा। "गलत तब होता जब तुझे अच्छा ना लगता।" दीदी ने मेरे कान में साँस छोड़ते हुए कहा। "बता… अच्छा लग रहा है ना?"

मैंने बस सिर हिलाया। फिर दीदी ने मेरे हाथ को अपनी साड़ी के नीचे सरकाया। मेरी उंगलियाँ उनकी जाँघ की मुलायम त्वचा पर पहुँचीं। वो धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ता गया। दीदी की साँसें तेज़ हो गईं।

"ऊपर… और ऊपर…" दीदी ने आँखें बंद करके कहा।

मेरी उंगलियाँ उनकी पैंटी तक पहुँच गईं। वो पहले से ही गीली थी। दीदी ने मेरी कमर पकड़कर मुझे अपने और करीब खींच लिया।

"चल… मेरे कमरे में चलते हैं।" वो बोलीं।

हम दोनों चुपके से दीदी के कमरे में चले गए। दरवाज़ा बंद किया, कुंडी लगाई। मोमबत्ती की रोशनी में कमरा सुनहरा लग रहा था।

दीदी ने मेरी टी-शर्ट उतारी। फिर मेरी पैंट की बेल्ट खोली। जब उन्होंने मेरी बॉक्सर नीचे सरकाई तो मेरी सख्त हो चुकी चीज़ बाहर आ गई।

"हाय… इतना तैयार बैठा था मेरे लिए?" दीदी मुस्कुराईं और उसे हाथ में ले लिया। धीरे-धीरे ऊपर-नीचे करने लगीं। मैं सिहर उठा।

फिर दीदी ने अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह गिरा दिया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। ब्रा भी उतार दी। उनकी गोरी-गोरी, भरी हुई छातियाँ मेरे सामने थीं।

मैंने झुककर एक निप्पल को मुँह में ले लिया। दीदी ने मेरे सिर को पकड़कर और जोर से दबाया। "हाँ… ऐसे ही… चूस… ज़ोर से…"

दूसरी तरफ मेरा हाथ उनकी पैंटी के अंदर था। उंगलियाँ अंदर-बाहर कर रहा था। दीदी की सिसकारियाँ बढ़ती जा रही थीं।

"अब… और नहीं सहन होता…" दीदी ने मेरे कान में कहा। उन्होंने पैंटी उतारी और बिस्तर पर लेट गईं। टाँगें फैलाकर बोलीं — "आजा… अपनी दीदी के अंदर आ… पूरी तरह भर दे मुझे।"

मैं उनके ऊपर चढ़ गया। अपना लंड उनके गीले छेद पर रखा। धीरे से अंदर डाला। "आह्ह्ह… हल्के से पहले…" दीदी ने कहा।

फिर एक गहरा धक्का। पूरा अंदर चला गया। दीदी की आँखें बंद हो गईं। उनके नाखून मेरी पीठ में धँस गए।

"हाय… कितना मोटा है तेरा… फाड़ डालेगा आज…"

हम दोनों एक-दूसरे में पूरी तरह खो गए। धक्के तेज़ होते गए। बिस्तर की चरमराहट और दीदी की सिसकारियाँ कमरे में भर गईं।

"और जोर से… चोद अपनी दीदी को… हाँ… ऐसे ही… गहरा… और गहरा…"

मैंने उनकी टाँगें कंधों पर रखीं और पूरी ताकत से धक्के मारे। दीदी चीख रही थीं — "आ रहा है… हाय… साथ में… साथ में ही…"

अगले ही पल दीदी का बदन काँप उठा। उनकी चूत सिकुड़ने लगी। मैं भी रुक नहीं पाया। जोर से धक्का मारा और उनके अंदर ही गरम-गरम झड़ गया।

हम दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे से लिपटे रहे। मोमबत्ती की रोशनी में पसीना चमक रहा था।

काफी देर बाद दीदी ने मेरे गाल पर हाथ फेरते हुए कहा — "कल फिर बिजली चली जाएगी… तब फिर से आएगा ना मेरे पास?"

मैंने बस उनके होंठ चूम लिए।

हम दोनों जानते थे… ये आग अब कभी नहीं बुझेगी।

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